देवशयनी एकादशी: जानिए देवशयनी एकादशी कथा व महत्व के बारे में

हिन्दू धर्म के अनुसार आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन भगवान विष्णु (जगन्नाथ) चार माह के लिए निद्रा में चले जाते हैं। इसलिए इस एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इस वर्ष 2020 में 1 जुलाई, दिन बुधवार को देवशयनी एकादशी मनायी जाएगी। 

देवशयनी एकादशी कथा – 

 पौराणिक कथा के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु पाताल लोक में चले जाते है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने धरती पर जब वामन रूप धारण किया था तब उन्होनें राजा बलि को वरदान दिया था कि पाताल लोक में उसे दर्शन देने आएँगे। भगवान विष्णु कार्तिंक माह की शुक्ल एकादशी तक पाताल लोक में ही शयन करते है।  इसलिए कहा जाता है, भगवान विष्णु निद्रा में चले गए। 

एक और मान्यता के अनुसार शंखचूर नामक असुर से भगवान विष्णु कई वर्षो से युध्द कर रहे थे। अंत में शंखचूर असुर पर विजय प्राप्त करते है। कई वर्ष से लड़ रहे युध्द से भगवान विष्णु थक जाते है। सभी देवगण भगवान विष्णु से आराम करने के लिए कहते है। इसलिए भगवान विष्णु पाताल लोक में शेषनाग की शैय्या पर जाकर सो जाते है। भगवान विष्णु के सो जाने के बाद भगवान शिव सृष्टि का कार्य देखते हैं। 

भगवान विष्णु को श्री हरि भी कहा जाता है।  जिसमे हरि व देव से तात्पर्य तेज से होता है। आषाढ़ माह से अगले चार माह तक सूर्य व चंद्रमा का तेज कम होने से प्रकृति का तेज भी कम हो जाता है। इसलिए कहा जाता है भगवान विष्णु शयन हो गए। हिन्दू धर्म के अनुसार भगवान की अनुपस्थिति में किए गए कार्य अशुभ माना जाता है। अतः इन दिनों कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता है। 

देवशयनी एकादशी से कार्य बंद – 

देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु निद्रा की अवस्था में चले जाते है। देवशयनी एकादशी से शादी विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, अतः सभी प्रकार के मांगलिक कार्य बंद कर दिए जाते है। शुभ कार्य इसलिए नहीं किए जाते है क्योंकि भगवान विष्णु के सो जाने पर उनका आर्शीवाद प्राप्त नहीं होता है। हिन्दू धर्म में भगवान का आर्शीवाद जरुरी है। इस एकादशी से संतो व तपस्वियों का भ्रमण कार्य भी बंद हो जाता है। केवल ब्रज की यात्रा प्रारंभ रहती है।

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देवशयनी एकादशी महत्व –

देवशयनी एकादशी सभी एकादशियों में श्रेष्ठ एकादशी मानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने व व्रत करने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस देवशयनी एकादशी के दिन झूठ नहीं बोलना चाहिये, किसी की आलोचना नहीं करना चाहिये, दूसरों को अपमानित नहीं करना चाहिये। देवशयनी एकादशी का सबसे बड़ा महत्व इस दिन भगवान विष्णु (जगन्नाथ ) के सो जाने पर सम्पूर्णं जगत भी निद्रा में चला जाता है। भगवान के जागृत होने पर जग जाग जाता है तथा सभी शुभ कार्य प्रारंभ कर दिए जाते है।

शुभ मुहूर्त –

समयदिन तिथि व वर्ष
प्रारंभ तिथि07:49 pmमंगलवार 30 जून 2020
समाप्ति 05:29 pmबुधवार 1 जुलाई 2020

पूजा विधि – 

  • इस दिन भगवान विष्णु को पंचामृत व पवित्र जल से स्नान कराया जाता है। 
  • इस दिन रात्रि में जागरण करना चाहिए। 
  • रात्रि के समय “ऊँ नमो नारायण” मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।
  •  भगवान विष्णु की मूर्ति को पीले रंग के वस्त्र पहनाये जाते है।
  •  भगवान विष्णु का पलंग तैयार किया जाता है।
  •  पलंग पर चादर व तकिया लगाकर भगवान को सुलाया जाता है।
  •  इस दिन व्रत करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। 
  •  अपने पितरों को भी इसी दिन सुलाया जाता है। 
  • इस दिन तपस्वियों को मौन रहकर व्रत धारण करना चाहिए।

विष्णु मंत्र

ॐ अं वासुदेवाय नम:

ॐ आं संकर्षणाय नम:

ॐ अं प्रद्युम्नाय नम:

ॐ अ: अनिरुद्धाय नम:

ॐ नारायणाय नम:

ॐ ह्रीं कार्तविर्यार्जुनो नाम राजा बाहु सहस्त्रवान।

यस्य स्मरेण मात्रेण ह्रतं नष्‍टं च लभ्यते।।

ॐ नमो नारायण। श्री मन नारायण नारायण हरि हरि।।

ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि।

तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।

ॐ विष्णवे नम:

भगवान विष्णु की आरती 

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।

भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।

सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी। तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥

पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।

किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे। अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।

कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥

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