पूर्णिंमा: जानिए आषाढ़ पूर्णिंमा के दिन ही क्यो मनाते है,गुरु पूर्णिंमा

आषाढ़ माह की पूर्णिंमा का हिंदू धर्म में बहुत अधिक महत्व होता है। आषाढ़ माह के दूसरे दिन से हिंदू कैलेंडर के अनुसार श्रावण का माह प्रारंभ हो जाता है। इस दिन से भगवान भोलेनाथ के भक्तों की भीड़ शिव मंदिरो में उमड़ आती है। आषाढ़ माह की पूर्णिंमा को ही गुरु पूर्णिंमा के रूप में मनाया जाती है। इस दिन महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था। इसलिए इसे व्यास पूर्णिंमा के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष 2020 में यह पूर्णिंमा 5 जुलाई, दिन रविवार को आषाढ़ व गुरु पूर्णिंमा के रूप में मनायी जाएगी।

आषाढ़ पूर्णिंमा – 

हिंदू कैलेंडर के अनुसार पूर्णिंमा विशेष तिथि होती है। वर्ष की सभी पूर्णिंमा बहुत ही खास होती है। जिसमें आषाढ़ पूर्णिंमा का बहुत अधिक महत्व है। आषाढ़ माह की पूर्णिंमा से तेज वर्षा का प्रारंभ हो जाता है। इस समय साधु संत एक जगह रुक जाते है। आषाढ़ माह की पूर्णिंमा से चार माह तक सभी व्रत व त्यौहार प्रारंभ हो जाते है। जिस दिन चंद्रमा का आकार पूर्ण होता है, उसे पूर्णिंमा कहते है। इस दिन चंद्रमा अपने पूर्ण रूप में होते है।

गुरु पूर्णिंमा – 

आषाढ़ माह की पूर्णिंमा को ही गुरु पूर्णिंमा कहते है। महर्षि वेद व्यास को भगवान का रूप माना जाता है। महर्षि वेद व्यास ने चारो वेदो में महाभारत की रचना की थी। द्वैपायन द्वीप पर जाकर तपस्या करने के कारण महर्षि वेद व्यास को कृष्ण द्वैपायन नाम दिया गया। इस दिन वेद व्यास का जन्म हुआ था इसलिए इस आषाढ़ पूर्णिंमा को गुरु पूर्णिंमा के रूप में मनाया जाता है।

गुरु पूर्णिंमा पर सभी गुरुजनो की पूजा की जाती है।  सभी अपने गुरु से मंगलमय जीवन की कामना करते है। प्राचीन काल में शिष्य शिक्षा के लिए गुरु के पास गुरुकुल में ही रहते थे। अपनी पूर्ण शिक्षा के बाद ही अपने गृह वापस आते थे। गुरु का स्थान सदा ही श्रेष्ठ माना जाता है। गुरु अपने शिष्य के लिए ईश्वर का रूप माने जाते है। 

गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वराय

गुरुर्साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः

अर्थात गुरु ही ब्रह्म है, गुरु ही विष्णु और महेश है। गुरु ही साक्षात् परम ब्रह्म के समान है। ऐसे गुरु को मेरा सदा ही प्रणाम हैं। हिन्दू धर्म में गुरु का स्थान सर्वोपरि बताया है। गुरु अपने शिष्य को अंधेरे से रोशनी की ओर ले आता है। ईश्वर तक जाने का गुरु के समान अन्य कोई मार्ग नहीं है।

कबीर के अनुसार –

 गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय 

बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दियो बताय 

गुरु का महत्व सदा ही अधिक होता है। परंतु गुरु पूर्णिंमा पर इनका महत्व और भी ज्यादा आधिक हो जाता है। गुरु सदा ही अपने शिष्य को परामर्श देकर उसे मार्ग पर भटकने से बचाते है। शिष्य को हमेशा सही मार्ग बताकर उसे शीर्ष तक पहुँचाते है।

पूर्णिंमा का महत्व – 

आषाढ़ माह की पूर्णिंमा अथवा गुरु पूर्णिंमा का बहुत अधिक महत्व है। इस दिन सभी शिष्य अपने गुरुजनो से आर्शीवाद लेते है। इस दिन अपने गुरुजनो की पूजा की जाती है। इस दिन गुरु दक्षणा का बहुत अधिक महत्व है। सभी को इस पूर्णिंमा पर गुरु दक्षणा अवश्य लेना चाहिये। बिना गुरु दक्षणा के किया हुआ दान, पुण्य व्यर्थ है। इस दिन सभी मंदिर व गुरु की समाधियों पर यह पर्व बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में धूनी वाले बाबा की समाधि है। यह गुरु पूर्णिंमा का उत्सव वहा बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

शुभ मुहूर्त –

समयदिन वर्ष 
प्रारंभ तिथि11:33 amशनिवार 4 जुलाई 2020
समाप्ति 10:13 amरविवार 5 जुलाई 2020

पूजा विधि –

  • गुरु पूर्णिंमा के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए।
  • उसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए।
  • इसके पश्चात इस दिन सत्यनारायण भगवान की कथा अवश्य करना चाहिए।
  • जिससे घर में सुख समृद्धि बनी रहे।
  • अपने गुरु की पूजा करना चाहिए। 
  • पूजन के बाद ब्रह्मणों को दान अवश्य करना चाहिए। 
  • अतः घर पर अपने गुरुजनो की आराधना करना चाहिए।
  • यदि उनकी प्रतिमा है, तो उसकी पूजा अवश्य करना चाहिए।
  • इस दिन गुरु मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।

 गुरु मंत्र

ऊँ ऎं क्रीं बृहस्पतये नम: ।

ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरुवे नम: ।

ऊँ श्रीं श्रीं गुरवे नम: ।

गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वराय

गुरुर्साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नमः

ऊँ देवानां च ऋषीणां गुरुं कांचनसन्निभम ।

बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम ।।

सद्‍गुरु की आरती

ॐ ये देवासो दिव्येकादशस्थ पृथिव्या मध्येकादश स्थ।

अप्सुक्षितो महिनैकादश स्थ ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम्‌॥

ॐ अग्निर्देवता व्वातो देवता सूर्य्यो देवता चंद्रमा देवता।

व्वसवो देवता रुद्द्रा देवता ऽऽदित्या देवता मरुतो देवता।

व्विश्वेदेवा देवता बृहस्पति द्देवतेन्द्रो देवता व्वरुणो देवता।

कर्पूर गौरं करुणावतारं संसार सारं भुजगेन्द्रहारम्‌।

सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि॥

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