अपरा (अचला)एकादशी: जानिए अपरा एकादशी की व्रत कथा और शुभ मुहूर्त

अपरा (अचला)एकादशी-

हिन्दू धर्म के अनुसार एकादशी का व्रत बहुत ही खास होता हैं। वर्ष भर में  24 एकादशियाँ होती हैं। परन्तु जब अधिक मास आता हैं, तब यह एकादशी 26 हो जाती हैं। ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी मनायी जाती हैं। इसे अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता हैं। इस वर्ष  2020 में यह 18 मई दिन सोमवार को अपरा एकादशी मनायी जाएगी। 

अपरा एकादशी व्रत कथा –

पौराणिक मान्यताओ के अनुसार महिध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा रहता था। उसके छोटे भाई का नाम बजध्वज था। वह अपने बड़े भाई से बहुत ही घृणा करता था। उसके अपने भाई के प्रति इतना द्वेष उत्पन हो गया कि उसने अपने बड़े भाई की हत्या कर दी तथा उसने एक पीपल के वृक्ष के नीचे गड्डा खोदकर वहा डाल दिया। 

                      उस पीपल पर वह राजा की आत्मा भटकने लगी। वहा के लोग इस बात से काफी परेशान रहने लगे। एक दिन वहा से एक ऋषि मुनि निकले । उन्होनें उस राजा की प्रेत आत्मा को अपने तपोबल से जान लिया और पीपल के वृक्ष पर बैठे राजा की प्रेतआत्मा को  नीचे उतारा । तथा उस प्रेति आत्मा  राजन को अपरा एकादशी व्रत रखने को कहा। 

                      उस राजन ने अपरा एकादशी व्रत पूरे विधि विधान से रखा। जिससे उस व्रत के फल से उसे मोक्ष की प्राप्ति हो गई। अतः अपरा एकादशी व्रत रखने से समस्त पापो से हमें मुक्ति मिलती हैं। 

         इस अपरा एकादशी के दिन व्रत करने से मनुष्य को अपने पापों से मुक्ति मिल जाती हैं। इस एकादशी व्रत की खास बात यह हैं कि मनुष्य अपने जीवन में कई पाप का भागी होता हैं,जैसे दूसरो के प्रति ईष्या की भावना रखना, दूसरो की ख़ुशी में दुख जताना। किसी की  सहायता न करना  आदि। इन सभी पापो से मुक्ति पाने के लिए अपरा एकादशी व्रत बहुत ही लाभकारी हैं। इस एकादशी के दिन व्रत करने से अपार पुण्य की प्राप्ति होती हैं। सदा मनुष्य को सुख की अनुभूति होती हैं। 

शुभ मुहूर्त –

 प्रारंभ तिथि12:42 दोपहर,17मई 2020
समाप्ति03:08,दोपहर 18 मई 2020

अपरा एकादशी पूजा विधि –

  • अपरा एकादशी व्रत के दिन सूर्योदय से पहले उठकर पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए।
  • ऐसा न हो तो घर पर ही नदी के जल को स्नान  के पानी में मिलाकर स्नान कर लेना चाहिए। 
  • तत्पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। 
  • भगवान त्रिविक्रम (ब्रह्म,विष्णु,महेश) की आराधना करना चाहिए।
  • पूजन सामग्री धूप अगरबत्ती, दीप, चंदन, फल, फूल, दूध, घी, से पूजा विधि पूर्ण करना चाहिए। 
  • इस दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। 
  • इस दिन व्रत करने के लिये छलकपट से बचना चाहिए। 
  • इस दिन सत्य ही बोलना श्रेष्ठ होता हैं। 
  • यह व्रत दूसरे दिन द्वादशी के दिन भगवान त्रिविक्रम की पूजा करके भोजन ग्रहण करना चाहिए। 
  • इस दिन भगवान “विष्णुसहस्रानाम” पाठ का जाप करना शुभ दायक होता हैं। 
  • इस दिन ब्रह्मण को दान पुण्य करना लाभकारी होता हैं। 

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